Hindi - दृढ-रहो

बाबा कहते थे काम करते, “ईंट नहीं, इंसान बनो। हर बोला शब्द, हर किया कर्म, कल अपने ही सामने गिनो।”

🎵 दृढ-रहो

सुबह की चुप्पी में आँख खुली, खिड़की पर ठहरी रोशनी। दुनिया चाहे शोर मचाए, मन ढूँढे अपनी सादगी। दरवाज़े पर कोई ठहरा, चेहरे पर थकान, आँख में डर। मैंने कुर्सी पास सरकाई, “बैठो, बातें करते हैं खुलकर।” मेरा दिल इतना नरम रहे, कि सख़्ती में भी कम न पड़े। मैं पहले सुनना सीख सकूँ, फिर कोई बात ज़ुबाँ पर चढ़े। ऐसी राह पर चलना है, जिस पर मन को गर्व रहे। जहाँ गिरा हो कोई थककर, मेरा हाथ उसके साथ रहे। बाबा कहते थे काम करते, “ईंट नहीं, इंसान बनो। हर बोला शब्द, हर किया कर्म, कल अपने ही सामने गिनो।” जब भीतर गुस्सा उठता है, मैं ठहर कर साँसें गिनता हूँ। सोचता हूँ, जो सामने है, शायद चुपचाप बहुत सहता हो। मेरा दिल इतना नरम रहे, कि सख़्ती में भी कम न पड़े। मैं पहले सुनना सीख सकूँ, फिर कोई बात ज़ुबाँ पर चढ़े। ऐसी राह पर चलना है, जिस पर मन को गर्व रहे। जहाँ गिरा हो कोई थककर, मेरा हाथ उसके साथ रहे। अक्ल का मतलब शोर नहीं, गलती पर सिर झुक जाना है। अपनी आवाज़ हल्की करके, किसी के दिल तक आना है। कभी जीत बड़ी नहीं होती, जितना एक अपनापन हो। कभी दुनिया बदल नहीं पाती, पर एक दिल रोशन हो। मेरा दिल इतना नरम रहे, कि सख़्ती में भी कम न पड़े। मैं पहले सुनना सीख सकूँ, फिर कोई बात ज़ुबाँ पर चढ़े। ऐसी राह पर चलना है, जिस पर मन को गर्व रहे। जहाँ गिरा हो कोई थककर, मेरा हाथ उसके साथ रहे।